'वो और मैं ' भाग १। (लेखिका - सौम्या वफ़ा )
वो और मैं
आज पूरे ३० बरस बाद मिल रहे थे , अपनी घड़ी के अनुसार। ब्रह्माण्ड के हिसाब से ३००० साल बाद और द्विआयामी धरती लोक की माया के समय के अनुसार मात्र ढाई साल बाद।
प्रेम जब गहरा होता है तो वो किसी और ही समय काल में विचरण कर रहा होता है , जिसका सिर्फ दिल दिमाग की कल्पनाओं से ही लेना देना होता है। ये ख़याल ट्रैफिक जाम में फँसी बेस्ट की बसों की कछुआछाप गति से भी धीमे धीमे सरक रहे होते हैं।
जबकि दुनिया मेट्रो में ज़बरदस्ती खुद को ठूँसती हुयी पैरों पे रेलगाड़ी के पहिये और जुबां पे अंगारे भरके तेज़ रफ़्तार से दौड़ रही होती है। ...और इधर प्रेम में रेंगने वाले धरती लोक के कीड़े असल में ख़याली स्वर्ग में सुनहरे हंस बने पंख लगाए उड़ रहे होते हैं ... हंस तो असल में वो अपने दिलबर या दिलरुबा के सामने ही होते हैं , ज़माने के लिए वो कभी गिद्ध तो कभी कौवा बन जाते हैं जिनसे या तो दुनिया डरती है या फिर इतना नापसंद करती है की उनकी प्रेम की मधुर पुकारें उन्हें कौवों की कर्कश कायें कायें सी लगती है और वो जहाँ भी डेरा डालते हैं वहीँ से बेइज़्ज़त कर के उड़ा दिए जाते हैं।
उसपर भी प्रेमियों की उड़ान का हौसला इतना होता है की ये आये दिन जब तब मिथ्या ही मिथक रुपी चिड़िया , फ़ीनिक्स बनके प्रेम की अग्नि में बार बार भस्म होकर उड़ने को त्यार बैठे रहते हैं।
ऐसे में कुछ बहुत ही लकी लोग होते हैं , जिन्हें सबके सामने ना सिर्फ हंस बनने का मौका मिलता है बल्कि दुनिया उनके हंस होने की मिसालें देती है।
लेकिन कुछ हंस ऐसे होते हैं जिन्होंने समंदर के पास पत्थरों के पीछे वाले खोपचे की बजाये , खुले आम एक चलती फिरती सड़क के किनारे दुनिया के बीच होते हुए भी अपना अलग मानसरोवर यानी सरेआम खुले में ही खोपचा बनाया होता है ।
सरल शब्दों में कहें तो आ बैल मुझे मार की कहावत सार्थक करते हुए खुले आम सच्चे प्यार की पींगें बढ़ाने की नापाक ज़ुर्रत कर रहे होते हैं। एक बार को अगर इनका प्रेम कोई खिलवाड़ या रात गयी बात गयी वाला मामला होता तो दुनिया इनको माफ़ भी कर देती मगर इनलोगों ने तो सारी हदें ही पार कर दी थीं।
लॉन्ग डिस्टेंस रिलेशनशिप मेन्टेन रखने की हिम्मत की , वो भी पूरे डेडिकेशन के साथ। उफ्फ्फ....वो भी मुंबई से कानपुर की !
इतनी दूरी में तो यहाँ लोग आकर एक्टर से ट्रैक्टर बन जाते हैं मगर इनका प्यार जस का तस बना हुआ था।
अब आप लोग सोच रहे होंगे की वो बड़े ही बेशरम हैं। असभ्यता फैला रहे हैं हमारे सुसभ्य भारत देश में। जहाँ आज तक किसी बच्चे ने अपने पापा मम्मी को किस करते नहीं देखा वहां बच्चे अब खुद खुले आम ये कर रहे हैं। इनसे भले तो वो हैं जो कम से कम चूहों और छछूंदरों के बिलों में जाकर शेर बन जाते हैं यानी वो समंदर के पास सैलाब को रोकने के लिए लगाए गए पत्थरों के पीछे चले जाते हैं।
बी • एम् • सी • को क्या पता था की ये नेचर'स कॉल है। मौसम जब बनता या बिगड़ता है तो फिर सैलाब आने से कोई नहीं रोक सकता , पत्थर भी नहीं और अब तो कलियुग है मतलब वो युग जब पत्थरों में ही सैलाब आते हैं ; समंदर तो बस लहरा के रह जाता है। उसकी गहराइयों में उतरने का अब किसी के पास जज़्बा या हौसला नहीं ।
ऐसे में इन बेचारों यानी 'मैं' और 'वो' ने ये खोपचा सरेआम बनाया ही इसलिए था कि असल में दोनों बहुत ही भयंकर वाले इंट्रोवर्ट थे।
ये सनी लियॉन और कुण्डी मत खड़काओ राजा सीधा अंदर आओ राजा के ज़माने में वही पुराना घिसा पिटा अमोल पालेकर और विद्या सिन्हा वाला प्यार करने की ज़ुर्रत कर बैठे थे। बस गनीमात थी की मुंबई में होते हुए भी अभी तक समंदर में नहीं डूबे थे।
बस रेत पे अपने पंजों के निशाँ छोड़ आये थे ; ये सोच के कि कभी और डूबेंगे।
आज तक डूबने से इनको इनके इंट्रोवर्ट नेचर ने ही बचा रखा था।
मतलब ये इतने इंट्रोवर्ट थे की समंदर के पास आज तक बस एक ही बार जा पाए थे। ..वहां के नज़ारों ने इनके दिलों में तो शोले भड़का दिए थे मगर बादल बनकर गरज कर बरस जाना इनके बस की बात नहीं थी , तो पहले तो थोड़ी देर दोनों इधर उधर बगलें झांकते रहे..... फिर बिना हाथ पकडे उतनी पास होकर चलने लगे जितनी दूरी में क़रीबी भी आ जाए यानी की चलें तो बिना पकड़ने की ज़हमत उठाये हाँथ आपस में टकरा जाएँ। और वो बस इसी में ख़ुश हो लें , ऐसा नहीं था की दोनों कहीं बंद कमरे में भी कुछ करने लायक नहीं थे। उन्हें भी मोहोब्बत उतनी ही अच्छी तरह से जतानी आती थी जितनी की औरों को , मगर बस प्रॉब्लम ये थी की मैं , वो को अपने कमरे यानी की चार लड़कियों से घिरे एक छोटे से one R.K. में नहीं ले जाना चाहती थी , पहला तो इसलिए की वो खुद ही बहुत अन कम्फ़र्टेबल हो जाती और दूसरा ये की कहीं वो एक्सट्रोवर्ट लड़कियां उसके नए नए इंट्रोवर्ट बॉयफ्रेंड को एक्सट्रोवर्ट बनने के नुस्खे ना सिखाने लगतीं।
खैर ये तो बीती बात थी , अब मैं की जॉब पक्की हो चुकी थी वो एक रेडियो स्टेशन पे टेक्निकल इंजीनियर हो गयी थी। तो अब उसका इस शहर में खुद का ONE RK था , जिसमें वो जानबूझ कर अकेले रहती थी ; पहला क्यूंकि वो इंट्रोवर्ट थी दूसरा वो सिंगल नहीं थी। अक्सर मैं उससे मिलने आ जाया करता था।
और दोनों समंदर से दूर अपना छोटा सा पोखरा बना के उसी में डूब जाते थे। ढाई सालों में वो भूल चुके थे की वो पहली दफा समंदर के किनारे ही मिले थे और अपने अपने पैरों के निशाँ छोड़ते हुए समंदर से कभी और डूबने का वादा कर के लौट आये थे। फिर उसके बाद कई बार डूबे मगर उस गहराई की तुलना समंदर से नहीं की जा सकती। इसलिए अब , इंटरवल के बाद ; समंदर का बदला लेने का वक़्त आ गया था।
यानी की कहानी रोमांचक होने वाली थी।
आज वो काली मनहूस रात आने वाली थी जब इनको , इनका यही इंट्रोवर्ट नेचर ले डूबने वाला था। वैसे ये मनहूस है या नहीं इसका फैसला तो मैं और वो ही करेंगे और कोई नहीं।
वैसे हम आप इस कहानी में अगर ये सोचने लगें कि बार बार बॉलीवुड , फिल्मों या हीरो हेरोइनों का ज़िक्र क्यों आ रहा है। .. तो ज़रा भी दिमाग पर ज़ोर मत डालियेगा क्यूंकि ये मुंबई यानी की फ़िल्मी नगरी की कहानी है जहाँ सिर्फ वही लोग हीरो हीरोइन बनने नहीं आते जिन्हें बड़े या छोटे परदे पर अपना हुस्न या हुनर दिखाना होता है , बल्कि यहाँ हर कोई हीरो और हीरोइन होता है अपनी अपनी चलती फिरती चलचित्र का।
और ऐसे ही आज वो के आने से मैं की इंटरवल के बाद थमी पिक्चर आगे बढ़ गयी थी।
यानी ढाई साल बाद आज जो मिलन होने वाला था उसके लिए दोनों ने पहले से काफी त्यारियां कर रखी थीं। ..वो ने मुंबई की बारिश का बिना चेतावनी बरस जाने का क़िस्सा बहुत सुना था और इस बार तो वो भरी बरसात के महीने अगस्त में मैं से मिलने आया था। ज़ाहिर सी बात है कि अब मैं का अपना कमरा था , यानी रास्ता भी अपना और मंज़िल भी अपनी , किसी बात का कोई डर नहीं। इंट्रोवर्ट होने का भी नहीं , इस ख़ुशी में स्टेशन पर उतरते ही वो ने मुंबई की फेमस स्टेशन साइड मार्किट से छाता और छतरी दोनों खरीदे।
मगर मार्किट की भीड़ और धक्का मुक्की में वो खुदको और अपने एक हफ्ते के सामान जितने छोटे सूटकेस को बचाता बचाता तो निकल आया मगर छाता नहीं बचा पाया। भीड़ की धक्का मुक्की में उसके हाथ से छाता कहीं गिर गया। आप लोग घबराइए नहीं , छतरी सलामत थी। पॉकेट में। खैर चूंकि बारिश कभी भी हो सकती थी मगर अभी भी नहीं हुयी थी तो बजाये नया छाता फिर से लेने के वो ने सीधा मैं के पास वर्सोवा पहुँचाना ज़्यादा ज़रूरी समझा।
इधर मैं ने भी आज ऑफिस से हाफ डे ले रखा था। वो आलरेडी सजी धजी आराम से सात बंगले पे बैठी एक कैफ़े में कॉफ़ी पी रही थी और वो की कॉल का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी। मैं ने यूँ तो आज की शाम के लिए कुछ और ही प्लान बनाया था जैसे की आज वो विद्या सिन्हा की जगह विद्या बालन बनकर आना चाहती थी , डर्टी पिक्चर की ना सही तो कम से कम तुम्हारी सुलु की तो बन ही जाना चाहती थी। लेकिन ऑफिस से छुट्टी ना मिलने की वजह से वो आज भी उतनी ही मामूली और इंट्रोवर्ट लग रही थी जितनी की हमेशा लगती है। हाँ पर फॉर आ ट्विस्ट उसने आज मनीष मार्किट से लौटते वक़्त एक रेड लिपस्टिक ज़रूर खरीद ली थी और लम्बी लम्बी फेक ऑय लैशेस भी। हमेशा पिंक या न्यूड शेड की लिपस्टिक लगाने वाली और आँखों में बस काजल भरने वाली 'मैं' आज पहली बार रेड लिपस्टिक और घनी घनी लम्बी ऑय लैशेस लगा के इतराने को बेताब बैठी थी।
बस बारिश ना हो तो। क्यूंकि हर लड़की की तरह वो भी बारिश में मेकअप के साथ कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। यूँ तो उसके पास भी छाता था , मगर आज उसने बारिश का फैसला करने के लिए छाते को इन्वेस्ट किया था।
मतलब मैं ने आज ऑफिस में उस ऐरे गैर नत्थू खैरे को भाव देते हुए अपना छाता दिया था , जो दो साल से मैं पे चांस मार रहा था। पर मैं वो के प्यार के इंतज़ार में उसे ना तो ना कह पा रही थी ना तो हाँ कह पा रही थी। ऐसे में आज जब फैसले की घडी थी तो बारिश , मुंबई , किस्मत और ज़िन्दगी ने मैं को एक बार फिर से इस नत्थू खिलाड़ी यानी अभी तक ग़ैर भाई साहब को अपना छाता देकर ; कल अगर हाँ हो तो उस हाँ को आज इन्वेस्ट करने का मौका दिया था। क्यूंकि किस्मत से नत्थू खिलाडी आज के दिन अपना छाता घर ही भूल गए थे और वो मुंबई से थाने का सफर छाते की सेफ्टी के बिना नहीं करना चाहते थे। ये मौका मैं के लिए अच्छा था। मैं ने मौका लपक लिया था ।
और नत्थू खिलाडी खुश होके खुद को सेफ समझ के चलते बने थे। और इधर मैं कैफ़े में बैठी खुशनुमा मौसम में कॉफ़ी मोका पे अपने मौके पे चौके जैसी पारी से खुश हो रही थी। असल में ये पहली दफा था जब मैं ने अपनी ख़ामोशी और संकोच से बहार निकल के , नत्थू खिलाड़ी की किसी भी बात के जवाब में कोई जवाब ना सही मगर हिंट ज़रूर दिया था। आखिर इससे पहले उसने मांगने पर भी किसी और को छाता नहीं दिया था , छाता तो क्या कुछ भी नहीं दिया था। और ये बात नत्थू खिलाडी को भी पता थी। आखिर ऑफिस में किसका , किस्से क्या है ये कब छुपता है ; हाँ क्यों है ये हमेशा छुपा रहता है। कोई भी क्यों में इंटरेस्टेड नहीं होता सब सिर्फ मसालों के चटखारों में ही स्वाद जानते हैं , क्यों बैंगन की सब्ज़ी सा होता है ना हर किसी को भाता है ना हर कोई हज़म ही कर पाता है। इसलिए स्टाफ में सब चाय कॉफ़ी के साथ स्नैक्स में गॉसिप ही खाना पसंद करते हैं। ज़ाहिर सी बात है किस दिन कौन सा स्नैक सर्व होता है इसकी खबर आज तक मैं को नहीं थी , उसे इन सबसे कोई मतलब ही नहीं था. शायद इसीलिए वो बॉस की चहेती भी थी आखिर बॉस एक सिंगल मदर का फेमिनिस्ट बेटा था , लकिली। जिसके चलते उसे घोंघे या जोंक नुमा मर्द ज़रा भी नहीं पसंद करते थे। लड़कियां फ़िदा थीं , औरतें इज़्ज़त करती थी और मैं तो उसे आदर्श बॉस मानती थी। मैं के डेडिकेशन ने ही उसे लास्ट ईयर ही प्रमोशन दिला दिया था ; असल में यहाँ भी उसको अपने इंट्रोवर्ट होने का ही फायदा मिला था ; क्यूंकि बाकियों की तरह मैं अपना टाइम और एनर्जी गॉसिप्स की जगह काम में ही लगाती थी और सबके लिए बोरिंग मैं ; बॉस के लिए इंटरेस्टिंग बन चुकी थी और उसका प्रमोशन हो गया था।
कभी कभी मैं को लगता था की वो इतनी शांतिपसंद खामोश लड़की ; कहाँ इस शोर भरे शहर में आकर फँस गयी है। मगर इसके अलावा और दूसरा कोई शहर भी नहीं था जहाँ मैं खुद को तलाश भी सकती थी और पा भी सकती थी। घर पे उसकी ख़ामोशी को क़ैद मिल जाती थी और इस शहर में उसकी ख़ामोशी लोगों को या तो उसका डर लगती है या फिर गर्व लगती है। लेकिन मैं को पता था की उसकी ख़ामोशी ना ही डर है , ना झूठा गर्व है , और ना ही तो वो वापस जाकर अपनी खमोशी को क़ैद की ज़ंजीरें पहनाएगी जिसके बाद उसे सिर्फ उन जंज़ीरों की ही खनक सुनाई देती थी उसकी अपनी आवाज़ तो उस तक आती ही नहीं थी। शायद इसिलए मैं ने आज वो के अलावा भी एक संकरी गली का कोना ढूंढा था , नत्थू खिलाड़ी उसी गली का कोना था जिसे बस देख कर गुज़र गयी थी मैं।
खैर, उधर वो ऑटो पकड़ कर सात बंगले आने को था , बारिश नहीं थी तो मुंबई के मौसम में काफी उमस थी ; वो पसीने में तरबतर हो गया था और उससे कहीं पसीने की बदबू तो नहीं आ रही ये चेक कर रहा था। मैं जितना एक्ससिटेड थी वो आज उतना ही नर्वस था ; वो की शकल पे मिलन नहीं मातम सी घबराहट छायी हुयी थी। मिस्टर वो अपने दो दोस्तों के आगे तो फेंकू चंद बनते थे , आईने के आगे जिस्म मूवी का जॉन अब्राहम और मैं के आगे जाते ही वो फिर से अमोल पालेकर हो जाते थे।
जो भी हो आज तो फैसले की घडी थी इसलिए वो की घबराहट का कोई पार नहीं था। असल में इस रिलेशनशिप में आज वो मोड़ आ गया था जब दोनों decide करने वाले थे की साथसाथ अब जीवन भर आगे चलते रहना है या फिर इस रिश्ते की रेलगाड़ी का आज ये आखिरी स्टॉप है। वो की तरफ से कुछ भी ठीक नहीं था , वो पिछले दो साल से UPSC की तैयारी कर रहा था , मगर हर बार दो तीन नम्बरों से रह जाता। जब तक सेलेक्शन नहीं हो जाता वो खुद बहुत कंफ्यूज था पर वो इतना स्वार्थी भी नहीं था की वो अपने चक्कर में मैं को रोक कर रखे और उसको जीवन में आगे ना बढ़ने दे. मगर वो मैं से इतना प्यार करता था की बिना मिले कोई भी फैसला नहीं लेना चाहता था , ताकि कल को कोई पछतावा ना रह जाए.
आज ये डेडिकेशन की कहानी डिवोशन तक तभी आगे बढ़नी थी जब मैं को लगता की वो में भी बराबर की आग अभी तक बाकी है। बस आते ही अग्निपरीक्षा शुरू होनी थी।
इधर मैं ने अपनी कॉफ़ी खत्म की ही थी की उधर वो की कॉल आ जाती है , मैं जल्दी से फ़ोन उठाकर उसे अपनी लाइव लोकेशन व्हाट्सएप्प करने को कह कर फ़ोन रख देती है , जबकि वो चाहता है की मैं उससे थोड़ा बात करती रहे ताकि उसकी घबराहट कम हो सके। एक तरफ वो घबराहट में पसीने से तरबतर था उधर कॉल आते ही मैं हड़बड़ाहट में पसीने से तरबतर हो गयी थी। दूर से देखें तो दोनों के पसीने की बूँदें और स्वाद एक ही जैसा था यानी की वही पानी सा पारदर्शी जिसके आर पार आपकी हालत साफ़ साफ़ दिख जाती है और स्वाद में नमकीन यानी की आपके दिल ने ज़ोर ज़ोर से धड़कने में जितनी भी exercise की होती है उन सबका खरा खारा निचोड़।
मगर कोई प्यार का एक्सपर्ट अगर इस पसीने का टेस्ट करेगा तो पायेगा की वो का पसीना थोड़ा ज़्यादा नमकीन था क्यूंकि उसमें अनदेखे भविष्य का डर था , मगर उतना ही शुद्ध भी था जितना की सच्चे प्यार की कड़ी मेहनत का पसीना होता है।
इधर मैं का पसीना कम खारा था जिसकी वजह से वो थोड़ा मीठा लग रहा था , क्यूंकि उसमें आने वाले कल का कोई डर नहीं था बल्कि उसकी जगह एक विश्वास और उस विश्वास को मज़बूत करता आत्मा विश्वास बह रहा था। विश्वास इस बात का की अगर प्यार होगा तो कुछ भी कर लेंगे कैसे भी कर लेंगे मगर निभा लेंगे। वहीँ आत्मविश्वास ना सिर्फ अपने उप्पर बल्कि वो पर भी था की वो यूँ ही हमेशा इम्तेहान ही नहीं देता रहेगा एक दिन वो इस इम्तेहान को पास भी कर लेगा।
यानी रिजल्ट के ऑब्जरवेशन में कहा जा सकता है की वो का पसीना खरा सोना था और मैं का पसीना सच्चा मोती। वो भी आज की अर्टिफिशियल दुनिया में।
वो ने इधर व्हाट्सएप्प खोला और लाइव लोकेशन को फॉलो करने लगा। उधर मैं हड़बड़ाहट में अपना बिल पे कर के दूसरे महंगे कैफे की तरफ दौड़ लगाती है , जो की सड़क के उस पार ही था। वो को आने में मुश्किल से ७ मिनट लगते। उस सात मिनट में वो को इस महंगे कैफ़े का टॉयलेट यूज़ करके वापस अपने उसी सस्ते कैफ़े में पहुँचना था।
वो के जैसे पंख निकल आते हैं और वो उड़ती हुयी सड़क के उस पार एक हाई फाई कैफ़े के दरवाज़े पे पहुँचती है , एक हसीं सादगी से भरी चिड़िया गेट पर जाकर गार्ड से जिस तरह चहचाती है उससे गार्ड न सिर्फ उसको अंदर जाने देता है बल्कि खुद ही टॉयलेट किधर है ये बताता भी है।
मुंबई में आपको सिर्फ महंगे और आलिशान कैफ़े में ही टॉयलेट की सुविधा मिलेगी। शायद उनको आज भी लगता है की गरीबों के लिए तो सारा समंदर पड़ा है। बाक़ी लड़कियों के लिए तो कौन ही सोचता है चाहे मुंबई हो या दिल्ली। ख़ैर ,
मैं फरफराती हुयी टॉयलेट में प्रवेश करती है , खुद को हल्का करती है फिर जल्दी जल्दी रेड लिपस्टिक लगाती है , ऑय लैशेस लगाती है। और वापस से उड़ती हुयी अपनी तय जगह पर पहुँच जाती है।
उधर वो का भी कुछ ऐसा ही हाल था तो वो ऑटो से उतरता है , उसके सामने ही कैफ़े होता है , उसे दूर से मैं दिख भी जाती है , मगर वो बजाये मैं के पास दौड़ कर पहुँचने के वो पहले खुद को सम्हालता है , और वो सड़क के पीछे बने सुलभ शौचालय की तरफ दौड़ लगाता है , वहां जाकर वो भी हल्का होता है , यानी की लघु शंका से निवृत्त होता है ; अच्छे से हाथ मुँह धो के अपना चेहरा ठीक करके अपनी ट्रॉउज़र की जेब से छोटा सा पॉकेट परफ्यूम निकलता है जो उसने ख़ास आज ही के दिन के लिए अब तक बचा के रखा था ; ये वही परफ्यूम था जो आखिरी बार मिलने पर मैं ने उसे गिफ्ट किया था ; तब जॉब नहीं थी और पैसे कम थे तो मैं बड़ी शीशी अफ़्फोर्ड नहीं कर सकती थी तो मैं ने ये छोटा सा ही परफ्यूम वो को भेंट किया था।
वो उसे तब ही लगाता जब उसे मैं से मिलना होता। इससे वो का कॉन्फिडेंस बूस्ट हो जाता था। अभी भी वही हुआ। तुरंत बूस्टर चढ़ाते वो वापस से भागा। मैं अब कैफ़े के बाहर ही निकल आयी थी ; उसने वो को सुलभ शौचालय की तरफ भागते देख लिया था। दोनों मिलते हैं , मिलते हैं का मतलब बस देख के मुस्कुरा के खामोश से साथ साथ रास्तों पे चलने लगते हैं।
हमेशा की तरह जिस खुशबू का दिन रात मैं को इंतज़ार रहता है वो उसे दूर से ही फ़ौरन महसूस कर के साँसों में भरने लगती है , मानो मैं को हौले हौले नशा चढ़ रहा हो फिर भी वो खुद को होश में बना के रखने की हरसंभव कोशिश कर रही हो। ये बिलकुल भी परफ्यूम के advertisement वाला नशा नहीं था। ये प्रेम की सुगंध का नशा था , जो वो के पसीने और बदन की प्राकृतिक खुशबू से आ रही थी ; परफ्यूम तो उस खुशबू में बस चार चाँद लगा रहा था। ; वही खुशबू जो मैं के घर से लेकर दिल के कोने कोने तक बसी थी ; वरना तो कोई भी परफ्यूम लगा सकता है , मगर कोई भी वो नहीं हो सकता। ना कोई भी वो बनकर दूर से ही मैं को महका सकता है।
इधर वो ने भी चटखती ख़ुशी को लाल रंग लगा के होंठो पे उतरते देख लिया था। देखा तो कुछ देर देखता ही रह गया ।
वो मैं से बोलता है , अच्छी लग रही हो...रेड लिपस्टिक में !
तारीफ के जवाब में आयी शर्म भरी मुस्कान ही वो मोहर थी जिससे वो को मैं के दिल की चाबियों के अधिकार मिले थे। और वो अधिकार आज तक उसी के पास सलामत थे ये बात वो समझ गया था। और मन ही मन फूल के गुब्बारा हो गया था , बच्चों के खेलने वाला नहीं , हॉट एयर बैलून हो गया था।
मैं सोचती है की वो शायद उसकी पलकों पर भी गौर करेगा , मगर वो का उधर कोई ध्यान नहीं जाता । मैं भी सोचती है की देखती हूँ कब तक नहीं जाता।
दोनों बड़े दिनों की दूरी मिटाने के लिए पहले अपने बीच दुनिया भर की बातों से एक दुनिया भरते रहे।
फिर जब दोनों को लगा की अब काफी दुनिया भर के बन चुकी है दोनों खामोश हो गए और बस चलते रहे। दोनों अपने नियत स्थान यानी खोपचे की तरफ पैदल आगे बढ़ते जा रहे थे।
इनका खोपचा असल में वर्सोवा की ही एक बीच (समंदर का किनारा) के पीछे की सड़क थी जहाँ कुछ इक्का दुक्का छोटे ठेले होते हैं , चाय , चाट और भुट्टों के। ..
आने जाने वालों में बस कपल्स ही होते हैं. यहाँ पे दोनों खुद को समंदर के किनारे से ज़्यादा सहज और मेहफ़ूज़ समझते।
क्यूंकि जो है सबकी आँखों के सामने पाकसाफ है। और ना ही तो आने जाने वालों को किसी की परवाह है। सब बेफिक्र से अपने में या एक दूजे में खोये होते हैं। किसी को किसी से कुछ लेना देना नहीं होता। यहाँ वही आते हैं जिनका नेचर और प्यार दोनों भीड़ से भागते हैं। यहाँ आके सब एक अजीब से सुकून ,अजीब सी ख़ुशी में बह जाते हैं। शायद इसीलिए समंदर को इन जैसों से रश्क़ होता है , क्यूंकि इन्होने समंदर को पीठ दिखाकर खुद में अपना एक अलग समंदर बना लिया होता है।
मैं और वो आज इसी समंदर को छूने यहाँ आये थे , बनाने के बारे में सोचना भी अभी तक उनकी हिम्मत के दायरे के बाहर का काम था। अब तक शाम के ०७:३० बज चुके थे यानी की अँधेरा हो चूका था। मतलब प्रेमियों के लिए उपयुक्त समय ; इसलिए नहीं की ये प्रेमी दुनिया से डरते हैं , इसलिए की दुनिया इनसे डरती है और जब दुनिया किसी से डरती है तो वो या तो उस डर को खत्म कर देती है या तो फिर डर को डराती है। यहाँ भी यही हाल था। ये निडर खुद को ख़तम होने से बचा रहे थे। ..बस।
वो और मैं अब इस गली के भीतर दाखिल हो चुके थे। ..उनको गली के आखिरी कोने तक जाना था। जहाँ बड़ी बड़ी गाड़ियों की पार्किंग होती है , वहीँ आखिरी में एक बहुत शांत पीपल का पुराना पेड़ सदियों से खड़ा है जैसे साक्षात महात्मा बुद्ध। यही वो पेड़ था जिसके चबूतरे पर पहली बार पास पास बैठे मैं और वो को एक दूसरे से ना सिर्फ प्यार हुआ था बल्कि जीवन का सारा ज्ञान मिला था। उस दिन वो बुद्ध बन गया था और मैं बोधिसत्व हो गयी थी।
तबसे अब यही तपस्या का नियत स्थान यानी की खोपचा है। वैसे आप लोगों की जानकारी बढ़ाने के लिए हम बताना चाहेंगे की मुंबई और ख़ास तौर से वर्सोवा और जुहू इलाके पीपल के नए पुराने वृक्षों से भरे पड़े हैं...कभी कभी तो एक ही सड़क पर आपको 7 -8 पीपल के पेड़ देखने को मिल जाएंगे... आश्चर्य मत करियेगा अगर हर सड़क पर इसी तरह बुद्ध और बोधिसत्व भी मिल जाएँ। ..
क्यूंकि हम जानते हैं अगर मिल भी गए तो आप उन्हें और उनके ज्ञान को सिरे से नकार देंगे , उससे उनका तो कुछ नहीं जायेगा , बल्कि आपको जो मिलना था वो भी ज़रूर चला जायेगा। मगर ये बात सबको कहाँ समझ में आती है।
खैर मुद्दे की बात करते हैं।
वो और मैं आज ढाई साल बाद इस बोधगया नुमा खोपचे में फिर उसी तपस्या में लीन हैं। वक़्त भी अब उनके साथ साथ हंस बन कर उड़ रहा है और उड़ते उड़ते बज जाते हैं 09 :00 .
चूँकि मैं यहाँ तभी आती है जब वो उसके साथ होता है , तो मैं यहाँ के करंट अफेयर्स से परिचित नहीं थी। दरअसल ये इलाका अब पुलिस पेट्रोलिंग लिस्ट में था ; जहाँ रात के 09 :00 बजते ही पुलिस आकर गश्त करती है , ताकि जेब , दिल और आँखें सब गरम हो जाएँ।
दुकानें भी सिमट जाती हैं , सिवाय एक सूप और एक चाय की दुकान के। सूप और चाय -कॉफ़ी वाले शाम में देर से दुकानें लगाते हैं ताकि देर रात तक अपनी दुकान चला सकें ; रात के समय मुंबई में बिक्री ज़ोरों पे होती है।
ये बताते चलें की मुंबई में जैसे नौकरियां , आशियाने , दिल और रिश्ते सभी चीज़ें पोर्टेबल और फोल्डेबल होते हैं वैसी ही ये छतरी के नीचे साइकिल पर सजाई गयी दुकानें भी होती हैं , ताकि रोज़ रोज़ की झंझट के अलावा जब भी बी .एम् .सी. की गाडी आये तो ये फ़ौरन अपनी दूकान लपेट के फरार हो सकें ; मानों सारी मुंबई तो इन्हीं बेचारों ने लूट रखी हो। ये तो समंदर की सबसे छोटी मछलियां हैं जिन्हें मछवारिनें ना तो बेचती हैं ना सूखा कर इनका चूरा बनाती हैं। इन्हें तो बिल्लियों और बगलुओं को भोग लगाने के लिए खासतौर से बचाकर रखा जाता है ; ताकि समंदर साफ़ रहे ,और पुण्य भी हो जाए।
ऐसे गहरे समंदर से रात के अँधेरे में ,पहली बार मैं और वो का सामना होने वाला था।
जब सारे हंस अपनी अपनी उड़ानें भरने में व्यस्त थे तभी दबे पाँव हंसों के बीच कौवे का आगमन होता है। इत्तेफ़ाक़ की ही ही बात है कि जहाँ एक तरफ ये कौवा खुद को हंस समझ रहा था वहीँ दूसरी तरफ सभी हंसों में हलचल मच गयी थी क्यूंकि उन्हें साफ़ साफ़ दिख रहा था की हंसों की महफ़िल में कौवे का प्रवेश हो चुका है।
जिन हंसों के जोड़ों को इसकी भनक हुयी वो पहले ही उड़ लिए और जो खोये हुए थे वो दबोच लिए गए। कुछ को बड़ी गाड़ियों में दबोचा गया , किसी को छोटी गाडी में , किसी को बाइक नामक वाहन पे किसी को स्कूटी नामक सपाटे यन्त्र पे।
जैसे की एक जोड़े को जब पुलिस नुमा कौवे ने आकर रंगे हाथों पब्लिक प्लेस पे अश्लीलता फैलाने के जुर्म में पकड़ना चाहा और उस गाडी की तरफ बढ़त की तो पास जाकर देखा की गाडी बी •एम् •डब्लु• एस यू वी है यानी , सीधे सीधे मोटी कमाई , सिपाही जब उस गाडी की तरफ गया और खिड़की के शीशे पे रौबदार दस्तक दी , तो बेचारे पुलिस वाले की वैसी ही हालत हो गयी जैसे कौवे की चील के आगे हो जाती है ; इस वक़्त गाडी में स्वयं सभी कौंवों के सरदार अपनी सरदारनी के साथ कुछ पल के लिए हंस होने का लुत्फ़ उठा रहे थे जिसमें आकर इस दो कौड़ी के कौंवे ने भयानक विघ्न उत्पन्न कर दिया था।
अंदर बैठे साहब ने खिड़की का शीशा नीचे किया। शीशा नीचे होते ही खुद पोलिसवाले को सलाम साहब कर के माफ़ी मांगनी पड़ी। साहब ने भर भर के सुनाने का मन करते हुए भी बस इशारे में पास आने को कहा और बड़ी विनम्रता से बोले , ये तुम्हारी भाभी हैं आगे से इनके आगे तमीज़ से पेश आना और घर वाली भाभी जी को इनके बारे में कोई भी भनक ना लगे इसकी भी ड्यूटी आज से तुम्हारी। कुछ भी गड़बड़ हुआ तो नौकरी ले लूंगा तुम्हारी।
सिपाही, जी साहब बोल के ठिठक कर रह गया। बी एम् डब्लु में कौन साहब बैठे थे इसका पता किसी को नहीं है सिवाए उस बेज़ुबान सिपाही के जिसकी जुबां उस दिन के बाद से आज तक सिली है। कैसे सिली है वो आपको पता लग ही गया होगा।
फिर निकलने से पहले सिपाही की ड्यूटी परस्ती की दाद देते हुए पूछा , वैसे कितनी पेनाल्टी लगाते हो ?
सिपाही कुछ सकुचाते हुए बोला , साहब लगाते तो ५००० की हैं कोई ५००० में इतना मोल भाव कर देता है की लगता है ५० रुपये भी खून बेच कर देना पड़ेगा बेचारों को , ऐसे लोगों को उठक बैठक करा के माफ़ करना पड़ता है। मिडिल क्लास वालों को तो इज़्ज़त इतनी प्यारी होती है की गिड़गिड़ा कर रो पड़ते हैं और जो कुछ भी उस वक़्त पास होता है सब दे देते हैं। बाकी अगर मोटी पार्टी हो तो उसे बस थाने ले जाने की धमकी दो तो पांच क्या १०,००० भी मिल जाते हैं।
साहब व्यंग्य भरी मुस्कान पुलिस वाले के उप्पर धूल की तरह उड़ाते हुए बोले - अच्छा है मगर ५००० से उप्पर नहीं लिया करो थोड़ी गुडविल बनाओ , ये कहकर साहब ने उसकी तरफ २००० का नोट बढ़ा दिया। सिपाही ने लेने से इंकार किया। तो साहब बोले रख लो आज हमारी तरफ से किसी को माफ़ कर देना। साहब अपनी दरियादिली की धूल झोंकते हुए निकल गए।
और इधर जैसे ही वो निकले वैसे ही उनकी गाडी के पीछे खड़े वो और मैं दो उजले हंसों के जोड़े की तरह वर्दी वाले कौवे की आँखों के सामने उजागर हो गए।
यूँ तो वो और मैं कुछ भी ऐसा नहीं कर रहे थे जिसे अश्लीलता की श्रेणी में दूर दूर तक भी लाया जा सकता हो। दरअसल वो हाथ में एक चिट्ठी ले के खड़ा था और मैं को देने ही जा रहा था की पुलिस वाले की नज़र उसपे पड़ गयी।
अब तक सभी प्रेमी जोड़े फरार हो चुके थे। मगर ये मैं और वो दुनिया से बेखबर अब भी सीना ताने वहीँ खड़े थे और पुलिस वाले को उनकी ये हिमाकत बर्दाश्त नहीं हुयी ; उसे तो तब मज़ा आता जब ये दोनों किसी गाडी में तेज़ रफ़्तार से भाग रहे होते और वो उनका पीछा करता। फिर ना सिर्फ अश्लीलता फैलाने के जुर्म में बल्कि सिग्नल तोड़ने के लिए भी चालान काटता यानी डबल कमाई। लेकिन ना;
कोई मज़ा नहीं आया ये दो पैदल लोग , यहाँ शान से खड़े थे।
सिपाही ने इंतज़ार किया की कुछ तो करें ताकि करते ही मैं इन्हें रंगे हाथों दबोच लूँ जैसे बगुला मछली को दबोच लेता है ठीक वैसे ही। मगर अपने बगुला भगत को १० मिनट गुज़र गए और इन दोनों ने बातों के सिवा कुछ ना किया। इधर मौसम भी काफी बिगड़ गया , तेज़ हवा चलने लगी यानी की बारिश शुरू होने को थी। पुलिस वाले से रहा ना गया और वो उनकी तरफ बढ़ा वो जैसे ही बढ़ा वैसे ही इतनी झमझमा के बारिश हो गयी मानों साक्षात् इंद्र देव , कामदेव और रति की प्रेम ताप क्रीड़ा में विघ्न डालने से राक्षस के उप्पर, क्रोधित हो बरस पड़े हों।
खुद को पुलिस के सामने देख, वो के हाथों से काग़ज़ का टुकड़ा छूट कर नीचे ज़मीन पर गिर जाता है और तेज़ रफ़्तार बारिश के साथ बह जाता है।
पुलिस वाला दोनों को थाने ले जाने की धमकी देता है तो मैं बोल पड़ती है कि किस जुर्म में ? पुलिस वाला बोलता है सरेआम अश्लीलता फैलाने के जुर्म में !
वो बोलता है की उन दोनों ने ऐसा क्या किया है जो अश्लील हो, क्या बात करना कोई जुर्म है ?
पुलिस वाले ने फ़ौरन कहा - नहीं पर तुम ये साबित कैसे करोगे की तुमने सिर्फ बात ही की और कुछ नहीं किया। इसपर थोड़ी देर के लिए मैं और वो दोनों सहम गए। और रौब जमाने के लिए पोलिसवाले ने मैं और वो से या तो जुर्माना देने की या फिर अपने अपने माँ बाप को फ़ोन लगाने की बात कही।
मैं ने बोला माँ बाप को क्यों फ़ोन लगाना है हम दोनों बालिग़ हैं , नौकरी करते हैं , अपने फैसले खुद लेने के काबिल हैं आप हमसे बात करिये , और अगर आपने कोई झूठा केस बनाने की कोशिश की तो मैं आप के ही खिलाफ अकेली लड़की को हर्रास्मेंट देने के लिए थाने में रिपोर्ट कर दूँगी।
पुलिस वाला भी इस धमकी से दो सेकंड के लिए सकपका गया। उसने फ़ौरन अपने तेवर संभालते हुए बात की।
देखिये मैडम रात बहुत हो गयी है और बारिश भी है आप इनको लेकर अपने घर जाइये !
इतने में अब , वो बोल पड़ा - क्यों आप इस तरह से किसी को भी सड़क पे चलने या खड़े होने से मना तो नहीं कर सकते।
पुलिस वाले को लगा की ये दोनों सिर्फ पाँव से पैदल हैं दिमाग से नहीं। इन्हें डराना या मूर्ख बनाकर पैसे वसूल करना थोड़ा मुश्किल है।
पुलिस वाला जब अपने दिमाग के पेंच लड़ा रहा था तो उसको याद आया की उसके आते ही वो के हाथ से एक क़ाग़ज़ का टुकड़ा गिर गया था।
उसने उसी के बेस पर उन दोनों को फिर से लपेटना शुरू किया । पुलिस वाला वो से पूछता है की तुम्हारे हाथ में जो काग़ज़ था वो तुमने मेरे आते ही डर के फेंका इसी से मुझे शक हुआ।
वो को थोड़ा झटका लगा। वो बोला मैंने काग़ज़ फेंका नहीं वो गिर गया हाथ से। लेकिन इससे क्या साबित होता है ?
इससे ये साबित होता है की वो प्रेम पत्र था और इस स्पॉट पे खड़े होक प्रेम पत्र देने का मतलब है की पहले और बाद में कुछ अश्लीलता तो की ही होगी।
अब मैं का गुस्सा काबू में ना रहा , क्या मतलब है आपका और आप हमसे कोई भी बात तभी कर सकते हैं या हमसे कोई भी जुर्माना तभी वसूल कर सकते हैं जब आपके पास कोई सबूत हो या फिर आपने अपनी आँखों से हमें कुछ करते देखा हो ; जो की आपने नहीं देखा है। तो अब बहुत हुआ अब अगर आप यहाँ से नहीं गए और हमें परेशान करना नहीं छोड़ा तो मैं एक रेडियो स्टेशन पर काम करती हूँ कल सुबह सुबह ही रेडियो पर आपकी बदतमीज़ी का सीधा प्रसारण होगा।
वो को मैं के तेवर और बहादुरी देख कर उसपर गर्व हो रहा था। तभी पुलिस वाले की नज़र मैं के हाथ में बारिश से बचाकर दबाये प्लास्टिक के फ़ोन पाउच के नीचे से झांकते काग़ज़ पे जाती है
पुलिस वाला उससे काग़ज़ दिखाने को बोलता है।
मैं काग़ज़ दिखाने से बचना चाहती है मगर उस वक़्त उसपे शेरनी सवार हो गयी थी। उसने बड़े ही बिंदास तेवर में वो काग़ज़ सिपाही के मुँह पर दे मारा।
मैं की ये कॉन्फिडेंस से भरी बोल्डनेस वो को लगातार क्लीन बोल्ड करती जा रही थी। थैंक गॉड उसने पोलिसवाले के सामने अपने एक्सप्रेशन छिपा रखे थे ;
दरअसल अगर आज कोई अश्लीलता फैलती तो उसका ज़िम्मेदार ये पुलिस वाला ही होता। .क्यूंकि अब तक तो सिर्फ बारिश ही हो रही थी लेकिन बारिश में आग तो पुलिस वाले ने लगाई थी।
उस काग़ज़ में चार लाइनों में प्रेम का इज़हार लिखा हुआ था। सिपाही ज़ोर ज़ोर से वो लाइनें पढ़ने लगा -
मेरा प्रेम गहरा दरिया है
अधूरा है बिना
तुम्हारा साथ बनके
उमड़ती लहरों के
मेरा प्रेम एक पन्नों पे उतरती परी सी
भोली भाली कविता है
अधूरा है बिना
तुम्हारी कलम से रोज़ नयी नयी जादू गढ़ती स्याही के
मेरा प्रेम सिन्दूरी गोधूलि है
अधूरा है बिना तुम्हारे आलिंगन के
बोलो बनोगे क्या तुम मेरी उमड़ती लहरें ?
बोलो गढोगे क्या तुम मेरे कोरे पन्नों पे
जादू के कुछ लम्हे सुनहरे ?
बोलो आओगे क्या तुम लेने गोधूलि की डोली
अपने आलिंगन के आँगन में ?
जितनी ज़ोर से कविता बोली थी उससे भी ऊंचे स्वर में सिपाही तंज़ सा करता हुआ बोलता है।
वाह ! वाह ! क्या बात ! क्या बात !
मैडम हमारे जैसों को तो समझ में नहीं आएँगी , मगर फिर भी अच्छा लिखा है आपने।
मैं अपनी बीवी को आज जाकर सुनाऊंगा , भाई साहब आपने भी मैडम के लिए कुछ ऐसा ही लिखा था ?
पुलिस वाला अपनी हरकतों से बाज़ नहीं आ रहा था , वो लगातार आग पे आग लगाए ही जा रहा था।
वो गुस्से में तपाक से सीधा बोलता है - नहीं ! और अब आप हमें काफी परेशान कर चुके हैं तो अच्छा होगा की आप यहाँ से जाएँ।
सिपाही आवाज़ में नरमी लाते हुए मैं से मुखातिब होता है - मैडम आपके साहब शरीफ लगते हैं और आप काफी तेज़ दिमाग और समझदार लगती हैं ; आप लोगों को सोच समझ के अपने मिलने जुलने की जगह ढूंढ़नी चाहिए थी , क्यों यहाँ खामखा बदनाम गलियों में आकर खड़े हो गए आप दोनों ?
मैं तुरंत बोल पड़ी जब मैं ढाई साल पहले आखिरी बार यहाँ आयी थी तब ये गली बदनाम नहीं थी वैसे ,गली तो आज भी बदनाम नहीं है , ये तो आप लोगों की वसूली की मार्केटिंग स्ट्रेटेजी है ; जो जब चाहो जिसपे चाहो नेगेटिव लेबल चस्पा कर दो ताकि
मैं ने इतना कहा ही था कि पुलिस वाले के तेवर सुलग गए और वो लम्बी चौड़ी कानून की धाराएं बताकर दोनों को अंदर करने की धमकी देने लगा। लेकिन अब वो के सब्र का पारा भी टूट चूका था ; उसने अपने सारे UPSC के ज्ञान को बटोरते हुए कंस्टीटूशन के बेसिक राइट्स से ले के आर्टिकल पे आर्टिकल उस सिपाही के मुँह पे मारने जब शुरू किये तो सिपाही अपना आप खो बैठा और वो की कॉलर पकड़ ली।
मामला काफी गरम हो गया था , इतना की ठंडी बारिश की बूँदें भी खौलने लगी थीं। मैं ने फ़ौरन 'स्टॉप इट '! चिल्लाया एंड 'यू रास्कल' बोलती हुयी सिपाही से बोल बैठी की देखना अब मैं तुम्हें कैसे कल सुबह सुबह एक्सपोज़ करती हूँ। इस पर सिपाही अब उसकी तरफ बढ़ चला और उसे धमकी देने लगा की तुमने पुलिस वाले को गाली दी है और धमकी दी है इसके जुर्म में तुम्हें थाने ले चलूँगा।
अब वो से भी नहीं रहा गया उसने मामला शांत करने में ही भलाई समझी , सिपाही भी अपनी ग़लती जानता था ; वो इन दोनों को ऐसे ही उठाकर थाने नहीं ले जा सकता था , वो को भी पता था की कहना आसान है मगर करना नहीं , वो उसको इतनी आसानी से रेडियो पर एक्सपोज़ नहीं कर पाएगी और फिर उसके खामियाज़े रेडियो कंपनी को भुगतने पड़ सकते हैं तो मामले को यहीं शांत करने में भलाई है।
ये वही भलाई थी जो हम सब हिन्दुस्तानियों को जब भी कोई मुसीबत आती है तो पैसों के सेटलमेंट के रूप में दिखाई देती है। चाहे पैसे हों और चाहे ना हों ।
खैर पैसे दे के मामले को रफा दफा किया गया। दोनों ने जो भी पैसे पास थे वो जोड़ जाड के सेटलमेन्ट किया और पोलिसवाले को १०.,००० का भुगतान किया , सच्चे प्यार को हमेशा की तरह आज भी बहुत भारी कीमत चुकानी पड़ी थी।
आज पोलिसवाले ने कानून की सेवा तो की ही थी खुद की जेबें भी भर भर के सेंकी थी , हाँ ये अलग बात थी की आज आँख सेंकने को नहीं मिला। रही बात बक्शीश के २००० की तो उससे सिपाही ने साहब के कहे अनुसार किसी को माफ़ कर दिया। उसने अपने पापी मन का बोझ हल्का करते हुए ; खुद को माफ़ कर दिया था।
जबकि वो के पास मात्र ५००० रुपये ही थे मुंबई में हफ्ते भर रह के ट्रेन से जाने के लिए , जो की अब नहीं रह गए थे ; बाकी के ५००० मैं ने अपनी मंथली सेविंग से दिया। दोनों के पास अब छुट्टे पैसों के अलावा कुछ नहीं था। मैं की सैलरी आने में अभी भी १० दिन बाकी थे। तो दोनों भूखे होने के बावजूद थोड़ी दूर पर लगी चाय की टपरी की तरफ जाने लगते हैं। माहौल में उदास सी ख़ामोशी है...दोनों के दिल भी भारी से हो चले हैं। बारिश अब बंद हो चुकी है , दोनों बिना छाते के सर से लेकर पाँव तक बिलकुल भीगे हुए हैं और शायद ऐसी ही हालत दोनों के दिलों की भी है।
वो को चुप्पी तोड़ने की पहल करना बेहतर लगता है और वो मैं से बोलता है, वैसे इससे पहले कभी तुम्हें इस तरह बिना डरे किसी पुलिस वाले से लड़ते नहीं देखा था , बड़ी हॉट लग रही थी...
मैं बोलती है - क्या...क्या लग रही थी...
वो झेंप सा जाता है..नहीं कुछ नहीं...मैंने कहा सूंदर लग रही थी...
नहीं हॉट ठीक है..मैं जानती हूँ मैं हॉट लग रही थी.
दोनों हंस पड़ते हैं...
वैसे तुम भी पहली बार ही मुझे हीरो लग रहे थे। ..
हीरो... कौन सा हीरो...
शहीद कपूर।
वो शर्मा सा जाता है...
आखिर शहीद कपूर की हीरो इमेज कितनी परफेक्ट है , हॉट भी , रोमांटिक भी , कॉमिक भी , चोक्लेटी ; ये वो के लिए अब तक का बेस्ट कॉम्पलिमेंट था।
मैं आगे बोलती है - हाँ और क्या वरना हमेशा तो अमोल पालेकर ही बने रहते थे , मुझे तो लगता था कहीं ऐसा ना हो की जैसे जैसे वक़्त और गुज़रे तो तुम अमोल पालेकर से अमोल गुप्ते न बन जाओ।
चलो दूकान आ गयी चाय पीते हैं।
वो इधर दो चाय का आर्डर करता है , उधर मैं नत्थू खिलाड़ी को फ़ोन करती है -
नत्थू खिलाड़ी मानो फ़ोन सीने से लगा के ही बैठा हो , एक ही रिंग में उठाकर बोलता है -
मुझे पता था तुम मुझे ज़रूर कॉल करोगी।
मैं तुरंत बोलती है - हाँ वो तो करना ही था , तुम मेरा छाता लेकर गए हो और तुम्हारी वजह से मैं बुरी तरह से भीग गयी , कल हर हालत में मेरा छाता मुझे वापस कर देना और हाँ ऑफिस में जो एक हफ्ते की पेड इंटर्नशिप की जगह खाली है उसके लिए नाम बता रही हूँ , फ़ौरन ऍप्लिकेशन टाइप करो मैं तुम्हें इस बन्दे का बायोडाटा भेजती हूँ। और अभी एक घंटे में ही वो एप्लीकेशन इस बायोडाटा के साथ बॉस को मेल कर देना। जूनियर हो इतना तो करोगे ही सीनियर के लिए और उप्पर से मैंने आज तुम्हें अपना छाता भी दिया था , तो एहसान उतारोगे या बचा के रखोगे ?
ये सब सुनते ही बेचारे नत्थू का दिल जहाँ था वहीँ टुकडे टुकड़े हो गया और आवाज़ भी नहीं आयी।
नत्थू ने यस मैम कह के फ़ोन रख दिया।
कॉल डिसकनेक्ट करके मैं वो के पास आयी और बोली , तुम चिंता मत करो ६००० रुपये में ऑफिस की पेड इंटर्नशिप की वेकन्सी आयी थी , जो क्वालिफिकेशन चाहिए उससे हायर क्वालिफिकेशन है तुम्हारी , एक हफ्ते मेरे साथ ऑफिस चलना तुम्हारे पैसे भी तुम्हें मिल जाएंगे , हम दोनों साथ में ज़्यादा से ज़्यादा वक़्त भी गुज़ार लेंगे और मैं ऑफिस में तुम्हें सबसे मिलवा भी दूँगी।
एक पंथ कई काज करने का मैं का हुनर देख के वो अपना दिल एक बार फिर हार बैठता है।
दोनों की चाय रेडी है , दूकान वाला आवाज़ लगाता है तो दोनों उसकी तरफ जाते हैं। ..
मैं और वो अपना अपना गिलास उठाते ही हैं की चाय वाला चाय खौलाते खौलाते जो बोलता है उससे चाय ज़रूरत से ज़्यादा गरम हो जाती है।
वो और मैं को साथ साथ देखते ही दूकान वाले के मुँह . से निकलता है अरे वाह क्या जोड़ी है। . वैसे ये लीजिये बरसाती मौसम की स्पेशल चाय ; आप दोनों को देख के पुराने दिन याद आ गए ;
अमिताभ बच्चन और मौसमी चट्टर्जी मेरी ही दूकान पर आकर चाय पीते थे..वो गाना सुना है ना आपने रिमझिम गिरे सावन सुलग सुलग जाए मन...उसकी शूटिंग यहीं होती थी समंदर किनारे। आप दोनों बिलकुल वैसे ही लग रहे हैं।
दोनों उसकी बातों का कोई जवाब नहीं देते। और अपनी अपनी चाय पीने लगते हैं।
इतने में एक और कपल वहां आता है। ऑडी सेडान से एक हैंडसम सा लड़का उतरता है और उसके साथ एक मॉडल जैसी लड़की भी बाहर आती है , दूकान वाला इस बार उन दोनों को चाय देते देते बोलता है। .वाह क्या जोड़ी लग रहीहै , इकदम रवीना टंडन और अक्षय कुमार....टिप टिप बरसा पानी वाले ; उसकी शूटिंग यहीं मेरी दूकान के उप्पर वाली छत पर हुयी थी...
वो दोनों उसकी बातों पे हँसते हैं , लड़का चाय के लिए मना कर के ५०० की नोट देता है और छुट्टे करवा के वापस ऑडी की तरफ चलता बनता है। तभी दूकान वाला उसे फिर से पीछे से आवाज़ लगाता है साहब एक चाय तो पी लीजिये बहुत ही बढ़िया है...
मौसम में ठण्ड तो थी ही , तो वो दोनों भी चाय पी ही लेते हैं। .. एक तरफ जहाँ वो दोनों जल्दी जल्दी चाय पी जाते हैं वहीँ मैं और वो इत्मीनान से भीगे होने के बावजूद ठण्ड में ठिठुरते हुए भी धीरे धीरे ही चाय पी रहे थे।
जब चाय वाले ने अमीर साहब ज़ादे की तरफ चाय का बिल बढ़ाया तो बिल देख कर जनाब अमीरज़ादे भी थोड़ी देर सन्न हो गए। ५०० रुपये !
हैरान होकर उसने पूछा। दूकान वाले ने बोला ; हाँ साहब हमारी बड़ी स्पेशल दूकान है और आपको तो सबसे स्पेशल क्वालिटी की चाय पिलाई है , सारे हीरो हीरोइन हमारे यहाँ ज़रूर चाय पीने आते हैं , जब भी आस पास कोई भी शूटिंग होती है। आप और मैडम भी तो इकदम हीरो हीरोइन ही लग रहे हैं... अमीरज़ादा समझ तो गया था मगर फिर भी उसने कुछ तो लड़की के सामने चापलूसी से खुश होकर और कुछ अपना इम्प्रैशन जमाने के लिए ५०० की नोट दुकानदार को उतनी ही आसानी से पकड़ा दी जितनी आसानी से ५ रुपये पकड़ाए जाते हैं।
दुकान वाला खुश और अमीरज़ादे साहब भी अब सन्न से प्रसन्न। दोनों की गाडी निकल पड़ी। चायवालों और दूधवालों से दुनिया हमेशा बनती रही है... क्या वो आप खुद ही समझ जाएँ तो बेहतर रहेगा और ऐसे चायवालों और दूधवालों से कैसे बचना और बचाना है ये भी आप लोगों को बेहतर पता होगा।
बाकी इधर ये सब होते देख के मैं दुकान वाले के पास धमक पड़ी। मैं ने १० रुपये का नोट दे पटका और वो के साथ निकलने लगी। इतने में दुकान वाला भी चिल्लाता हुआ पीछे पीछे आया , मैडम मैडम १०० रुपये हुए आपके , ये १० रुपये वाली चाय नहीं है... उसने इतना बोला ही था की मैं पलटी और बोली चाय तो वैसे तुम्हारी ५रुपये वाली है , दो कप ली थी इसलिए सोचा १० रुपये दे देती हूँ , और अगर ज़्यादा पैसे चाहिए इस सड़ी हुयी चाय के तो बताओ मैं रेडियो स्टेशन पे काम करती हूँ , कल ही तुम्हें और तुम्हारी दूकान को यहाँ पर आये सभी हीरो हिरोइनों के साथ मशहूर करती हूँ।
मैं की बात से डर के दूकान वाले ने तुरंत हाथ जोड़ लिए और माफ़ी मांगता हुआ बोलने लगा माफ़ कर दीजिये मैडम ग़लती हो गयी !आज के बाद आपके साथ कभी ऐसा नहीं करूँगा , आपके और आपके मेहमानों के लिए अब हमेशा फ्री चाय ; ये लीजिये आपके १० रुपये , आप रख लीजिये। बस हमारी दुकान के बारे में कुछ उल्टा सीधा मत बोलियेगा रेडियो पे ; हाँ अगर आप फ्री की पब्लिसिटी कर देंगी हमारी तो हम आपके पूरे रेडियो स्टेशन को फ्री में चाय पिलाया करेंगे।
मैं ने १० का नोट वापस किया और इसकी कोई ज़रूरत नहीं है बोलते हुए वो के साथ निकल गयी।
वो और मैं बचे हुए २० रुपये लेकर ऑटो पकड़ने के लिए सड़क के उस पार साथ साथ चलने लगे। शुक्र है घर पास ही था तो वो २० रुपये में पहुँचाने के बारे में सोच सकते थे।
क़दम चल के ऑटो पकड़नी थी। चलते चलते दोनों के हाथ एक दूसरे के हाथ को छूते हुए उसी तरह आपस में टकराकर खुश हो रहे थे जैसे हमेशा खुश होते हैं।
मैं ने वो से पुछा - तुमने उस काग़ज़ में क्या लिखा था..... ?
सवाल सुनते ही एक मिनट के लिए वो की सांसें उप्पर नीचे हो गयीं , फिर उसने गहरी सांस भरते हुए बोला -
कुछ नहीं - बस उप्पर तुम्हारा , नीचे मेरा नाम लिखा था।
वापस से एक ख़ामोशी आकर फिर से चादर में दोनों को समेट ले गयी । ये ख़ामोशी इतनी हसीं और खूबसूरत थी कि इसे तोड़ने का ना तो मैं का दिल किया ना ही वो का।
बस दोनों के क़दमों के साथ साथ हाँथ भी साथ साथ चलते रहते हैं। हाथ चलते चलते टकराते टकराते पहली बार एक दूसरे को थाम लेते हैं। हाथों की पकड़ से यूँ तो वो दोनों अनजान ही होते हैं मगर मन आँखों से लेकर होंठों तक मुस्कुरा रहा होता है। हाथों की गर्मी से शरीर की ठिठुरन भी कांपना बंद करके सधी हुयी कुछ लहराती हुयी यूँ चलने लगती है जैसे जानती हो की अब रास्ता भी उसका है और मंज़िल भी उसकी।
दोनों ऑटो करते हैं , मैं ऑटो में बैठते ही अपना भीगा हुआ कोट कुछ इस तरह टांगती है , कि ऑटोवाले को कुछ भी नहीं दिखता । चलती ऑटो में इस कोट के मोटे परदे के पीछे एक छोटा चलता फिरता कमरा बन जाता है जहाँ , धीरे से मैं वो के कानों में पूछती है -
मैं कैसी लग रही हूँ ?
वो बोलता है - बिलकुल तुम्हारी favorite विद्या बालन !
तुम भी शहीद कपूर लग रहे हो।
... किस्मत कनेक्शन वाले !
वो - उसमें तो विद्या बालन भी थी ना...
मैं - हाँ। ...
दोनों एक दुसरे का हाथ ज़ोर से थामे मुस्कुरा देते हैं...
तभी वो का ध्यान मैं की आए लैशेस पर जाता है .. वो धीरे से उँगलियों से उन नकली पलकों को हटा देता है , जो बारिश में धुल जाने से निकल गयीं थीं।
मैं को वो का इस तरह से उसका ध्यान रखना ,ध्यान जताने से भी कहीं ज़्यादा प्यारा लगता है , क्यूंकि उसमें फिक्र थी और उससे भी ज़्यादा उसे जैसे का तैसा स्वीकार करने की ख़ुशी ।
दो हाथ जो खुद को एक दूजे के हाथों में सौंप चुके थे अब एक नरम गर्म सी पनाह बनकर एक दुसरे को आग़ोश में भर लेते हैं।
अपनी सी लगने वाली आग़ोश बारिश में भीगी उलझनों को भाप बनाकर उड़ा देती है।
वो मैं का चेहरा अपने होंठों के पास लाके उसका माथा चूम लेता है। मैं वो के कन्धों पे दुनिया की सारी फ़िक्र कोसों दूर छोड़ते हुए अपना सर टिका देती है।
दोनों अपनी अपनी किस्मत पहचान कर उसका फैसला अब एक दूसरे के हाथों में हमेशा के लिए सौंप चुके हैं।
इस सुकून की दो घडी में सांस भरते हुए ;
वो मन ही मन पोलिसवाले को शुक्रिया कहता है , क्यूंकि अगर पोलिसवाला आज नहीं आया होता तो वो उस काग़ज़ को मैं को दे देता जिसपर मैं और वो के नामों के बीच लिखा था , " कि मैं तुम्हारे लिए शायद नहीं बना हूँ , शायद मेरा प्यार इतना सच्चा नहीं है , इसलिए मुझे भूल जाओ। " तुम्हारा - 'वो '!
मैं और वो की पिक्चर अब पूरी होने को थी। एक ग़लत जगह इन्वेस्ट किया हुआ छाता सूद समेद वापस आने वाला था और एक छतरी अभी भी पॉकेट में सलामत थी ; जो इन दोनों हंसों की छत को ज़रूरत से ज़्यादा भीगकर सर पे गिर जाने से बचा कर रखती।
अब इसमें क्या कुछ भी मनहूस था ..? अगर था भी तो इसका फैसला वो और मैं ही करें...
बारिश ने तन मन भीगा दिए थे.. प्रेम की आग ज़माने ने ही लगाई थी और कभी समंदर से डर के चले आये दो लोग;
मैं और वो ; अब समंदर से भी ज़्यादा गहरे हो चुके थे।
और यही समंदर का बदला था !
सौम्या वफ़ा। ©
( ये कहानी और इसमें लिखी कविता दोनों संपूर्ण एवं मूल रूप से इसकी लेखिका के अधिकृत हैं , जिसका लेखिका की मर्ज़ी और इजाज़त के बिना किसी भी माध्यम में प्रयोग वर्जित है एवं कानूनी रूप से दंडनीय अपराध है। )